अपनी बात

शर्मनाकः एक ओर रांची में ही रांची प्रेस क्लब के एक सदस्य की चिता धू-धू करती जल रही थी और दूसरी ओर इन सबसे दूर रांची प्रेस क्लब के अधिकारियों का समूह अपने अन्य सदस्यों के साथ होली की मस्ती में डूबा था

सचमुच इससे बड़ी शर्मनाक घटना और क्या हो सकती है। एक ओर रांची के खलारी में कल यानी 12 मार्च को रांची प्रेस क्लब के सदस्य मुक्तिनाथ गिरि की चित्ता धू-धू करती जल रही थी और दूसरी ओर इन सबसे दूर रांची प्रेस क्लब के सदस्य अपने अधिकारियों के साथ, प्रेस क्लब में एक साथ मिलकर होली के राग-रंग में डूबे थे, मस्ती में थे, नाच रहे थे, गा रहे थे, सुस्वादु भोजन का आनन्द ले रहे थे। किसी को इतनी भी चिन्ता नहीं थी कि आज ही उसके एक मित्र, उसी के सदस्य की रांची के ही खलारी में चित्ता धू-धू कर जल रही है।

मतलब एक लोकोक्ति है। आग लगे बस्ती में, मस्तराम मस्ती में, वाली लोकोक्ति रांची प्रेस क्लब के अधिकारियों व उनके सदस्यों ने चरितार्थ कर दिया। हालांकि इस दुखद घटना पर रांची प्रेस क्लब के एक-दो सदस्यों ने सवाल उठाया। क्लब फॉर इन्फॉरमेशन में इस मुद्दे को रखा। लेकिन, किसे इतनी फुरसत थी कि वहां ध्यान दें, सभी को होली की मस्ती सूझी थी। सभी के तन-मन में होली ने ऐसी आग भड़का रखी थी कि सभी उस होली की अगन को राग-रंग से बुझाने की कोशिश कर रहे थे और इसे हवा दे रहे थे, वे रांची प्रेस क्लब के अधिकारी, जिन्हें तनिक भी शर्म नहीं हैं।

खलारी में मृतक मुक्तिनाथ गिरि के अंतिम संस्कार का एक दृश्य

बताया जाता है कि मृत मुक्तिनाथ गिरि कोई सामान्य पत्रकार नहीं थे। अपने इलाके में उन्होंने पत्रकारिता का मान बढ़ाया था। बताया यह भी जाता है कि दस मार्च को उनका ब्रेन हेमरेज हुआ, जिसके कारण उन्हें आनन-फानन में रांची के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया। 11 मार्च को उनका निधन हो गया और 12 मार्च को उनका खलारी में दाह संस्कार कर दिया गया। लोग बताते है कि मृतक मुक्तिनाथ गिरि कभी रांची एक्सप्रेस और प्रभात खबर से भी जुड़े थे।

रांची प्रेस क्लब के ही एक पूर्व पदाधिकारी ने विद्रोही24 को बताया कि रांची प्रेस क्लब के सदस्यों ने ही एक प्रस्ताव को मंजूर करते हुए, उस प्रस्ताव के मुताबिक जिस भी किसी रांची प्रेस क्लब के सदस्य की मृत्यु होगी, उनके शव को कुछ पल के लिए रांची प्रेस क्लब में रखा जायेगा, जहां उनके चाहनेवाले व अन्य रांची प्रेस क्लब के सदस्य उनका अंतिम दर्शन करेंगे व श्रद्धांजलि देंगे, मंजूर किया था। ऐसा कई मृत पत्रकार साथियों के साथ हुआ भी है। लेकिन मुक्ति नाथ गिरि को ये सब नसीब नहीं हुआ। आखिर क्यों? जबकि रांची के मेदांता से ही उनका शव खलारी ले जाया गया था। मेदांता से रांची प्रेस क्लब की दूरी कोई ज्यादा भी नहीं थी। सवाल तो उठता ही है, कहीं इसलिए तो नहीं कि मुक्ति नाथ गिरि के पास वो हस्ती नहीं थी, जैसा पूर्व में अन्य लोगों के साथ था।

रांची प्रेस क्लब के ही एक पूर्व पदाधिकारी ने विद्रोही24 को बताया कि जब रवि प्रकाश जी का 20 सितम्बर 2024 को निधन हुआ था, तो उनके शव को 21 सितम्बर को प्रेस क्लब में कुछ पल के लिए रखा गया था, जहां सभी ने श्रद्धाजंलि दी थी। यहीं नहीं, इसके दूसरे दिन 22 सितम्बर को रांची प्रेस क्लब का फांउडेशन डे था। जिसे स्थगित भी कर दिया गया। ऐसे में आज ये सवाल तो जरुर उठेगा कि जब रांची प्रेस क्लब का फाउंडेशन डे, किसी के शोक में स्थगित किया जा सकता है, तो क्या ये होली मिलन समारोह इतना महत्वपूर्ण था कि इसे स्थगित नहीं किया जा सकता था।

आखिर होली मिलन समारोह 12 मार्च की जगह अन्य दिन हो जाता तो क्या पहाड़ टूट जाता। होली मिलन तो होली के बाद भी किया जा सकता था? ऐसी कौन सी बात हो गई कि होली मिलन 12 मार्च को जो मुकर्रर हुआ, वो 12 मार्च को ही संपन्न हुआ। भाई,  जब आपके अंदर मानवीय मूल्य ही नहीं, तो फिर आपकी होली, होली मिलन कैसे हो गई?

आश्चर्य तो यह भी है कि लोगों ने होली खेला भी और उसके फोटो अपने अपने सोशल साइट पर डाला भी। शायद वे मृत मुक्ति नाथ गिरि को ये दिखा/चिढ़ा रहे हो कि देखिये मुक्ति नाथ गिरि जी किसी के मौत से हम गमगीन नहीं होते, हमारे लिए होली ज्यादा महत्वपूर्ण है, किसी के मौत के वनिस्पत। शायद ये रांची प्रेस क्लब के अधिकारी और सदस्य होली मिलन कर, ये भी दिखाने की कोशिश की हो, कि देखिये मुक्तिनाथ गिरि जी, आप चिता के साथ और हम रंगों के साथ होली का आनन्द ले रहे हैं। जहां ऐसे लोग हो, जहां ऐसी सोच हो, ऐसे लोगों को अगर विद्रोही24 दूर से ही प्रणाम करता है, तो क्या गलत करता है?

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