अपनी बात

होली को लेकर सरकार के निर्देशों को भी हल्के में लिया पुलिस अधिकारियों ने, गिरिडीह व रांची में घटी हिंसक घटनाएं, एक पुलिस अधिकारी द्वारा दस फीट जमीन में गाड़ देने के बयान भी राजधानी रांची में फेल

12 मार्च को राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने होली, सरहुल, रामनवमी और ईद को लेकर राज्य के वरीय प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के साथ विधि-व्यवस्था को केन्द्र में लेकर एक बैठक की थी। उस बैठक में मुख्य सचिव अलका तिवारी, अपर मुख्य सचिव अविनाश कुमार, प्रधान सचिव गृह विभाग वंदना दादेल, डीजीपी अनुराग गुप्ता, पुलिस महानिरीक्षक विशेष शाखा प्रभात कुमार, पुलिस महानिरीक्षक अभियान ए०वी० होमकर, पुलिस महानिरीक्षक अपराध अनुसंधान विभाग असीम विक्रांत मिंज, पुलिस महानिरीक्षक मुख्यालय मनोज कौशिक सहित अन्य वरीय पुलिस अधिकारी उपस्थित थे।

उस बैठक में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने कई आवश्यक दिशा-निर्देश भी जारी किये थे। लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि इस महत्वपूर्ण बैठक के बावजूद राज्य के आला-अधिकारियों की अकर्मण्यता और असामाजिक तत्वों की सक्रियता ने झारखण्ड पर होली के दिन दाग लगा ही दिया। मतलब स्पष्ट हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री के दिशा-निर्देशों का भी अक्षरशः पालन यहां नहीं हो रहा, अगर होता तो होली के दिन गिरिडीह नहीं जलता और न कोई असामाजिक तत्व होली खेल रहे लोगों पर पत्थरबाजी करता, न आगजनी करता।

अब इधर राजधानी रांची में देखिये। यहां के एसएसपी चंदन कुमार सिन्हा शांति समिति की बैठक में उसी दिन बोल क्या रहे थे? बोल रहे थे कि होली में जान बूझकर किसी ने बदमाशी की, तो दस फीट जमीन में गाड़ देंगे। तो लीजिये एसएसपी साहेब गाड़िये दस फीट जमीन में उन्हें, जिन्होंने नामकुम और चुटिया में होली के दिन गड़बड़ियां करके आपको चुनौती दे दी। आपको तो पता ही होगा कि चुटिया में दीपक दूबे की पत्थर से कूंचकर हत्या कर दी गई और रांची के नामकुम में वो भी रेलवे स्टेशन के पास दो गुटों में तलवारबाजी की घटना हो गई और उस घटना में एक की मौत और तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। इसके बाद दो गुटों में ऐसी हिंसा यहां भड़की कि पूरा क्षेत्र ही छावनी में तब्दील हो गया। बताया यह भी जा रहा है कि घायलों में सभी की हालत नाजुक है।

अब सवाल उठता है कि जब मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने सारे अधिकारियों के साथ बैठक की और बैठक के बाद भी राज्य के किसी कोने में सांप्रदायिक घटनाएं घटती हैं। दो गुट आपस में भिड़ जाता है और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठ जाती है। घटना घटित हो जाने के बाद वो एक्शन में आती है तो ऐसे एक्शन से राज्य की निर्दोष व शांतिप्रिय जनता को क्या मतलब? यहां की जनता इनका संवाद सुनने के लिए तो बैठी नहीं हैं और अगर संवाद ही देने की इतनी बेचैनी हैं, तो संभल के सीओ अनुज कुमार चौधरी की तरह दीजिये न।

जिसने संभल में रहकर डायलॉग भी मारे और होली में हिन्दूओं की होली भी शांति से मनवा दिया और उधर मुसलमानों को नमाज भी पढ़वा दी और आपलोगों यहां क्या कर रहे हैं? डॉयलॉगबाजी कर रहे हैं और जब परिणाम की बात आती हैं तो रांची में ही दो जगहों पर विभिन्न घटनाओं में दो लोगों की हत्या हो जाती है और कई घायल हो जाते हैं। उधर मुख्यमंत्री की कड़ी चेतावनी के बावजूद गिरिडीह में होली खेलने पर आफत आ रही हैं। अब ऐसे में तो ऐसे पुलिस अधिकारियों के रहते तो भविष्य में अब होली मनाना और रामनवमी का त्यौहार मनाना आफत हो जायेगा।

झारखण्ड में तो स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। हाल ही में खूंटी में एक समुदाय ने हिन्दूओं को सरस्वती पूजा मनाने नहीं दिया था। गिरिडीह में होली के दिन पत्थरबाजी और आगजनी हो गई। रांची में दो गुट आपस में भिड़ गये। इसका मतलब क्या है? कि राज्य में जिन पर कानून-व्यवस्था को ठीक करने की जिम्मेदारी है, वे कैसी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, आम जनता के सामने हैं।

इस प्रकार की घटनाओं ने आम जनता का झारखण्ड पुलिस के प्रति जो अविश्वास को जन्म दिया हैं। वो भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें, जिनके ड्यूटी में रहने के बावजूद होली में गिरिडीह और रांची में हिंसक घटनाएं घटी, नहीं तो मंगलवार को सदन जब चलेगा तो विपक्ष इन घटनाओं को लेकर प्रश्नकाल चलने नहीं देगा, यह भी सत्य है।

एक बात और, रांची के एसएसपी साहेब चंदन कुमार सिन्हा जी, लगे हाथों यह भी बता दीजिये कि जब आप अपराधियों को दस फीट जमीन के अंदर गाड़ ही देंगे तो कोर्ट में बैठे जज साहेब क्या करेंगे? ये जनता जानना चाहती है, जरुर से बताइयेगा, वो भी प्रेस कांफ्रेस कर, ताकि ये बात भी आम जनता को तथा न्यायालय को मीडिया के द्वारा डायरेक्ट पता लग सकें।

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