क्या प्रेस दीर्घा में बैठा कोई पत्रकार बता सकता है कि हर वक्त मोबाइल लेकर बैठनेवाले विधायक या मंत्री सदन में मोबाइल का उपयोग करते हैं, अगर नहीं तो फिर आप विधानसभाध्यक्ष के आदेश की अवहेलना क्यों कर रहे हैं?
ये ठीक नहीं, इसे सुधारा जाना चाहिए, जब आप आदेश देते हैं, तो कम से कम आप अपने आदेश का तो पालन करवा ही सकते हैं और जब ऐसा नहीं करवा पायेंगे तो फिर मर्यादाएं तो प्रभावित होंगी ही। उससे नुकसान किसका होगा? इसका चिन्तन-मनन भी होना चाहिए। समितियां किसलिए बनती है? इसीलिए न ताकि कार्य सुचारु व संयमित तरीके से संपन्न हो, लेकिन कार्य सुचारु व संयमित तरीके से संपन्न न हो और जैसे-तैसे चले तो भले ही कोई भय के मारे अंगुलियां न उठाएं, लेकिन जिसके अंदर जमीर हैं, वो तो अंगुलियां उठायेगा ही।
हम बात कर रहे हैं झारखण्ड विधानसभा की। आज विधानसभा का पहला दिन था और हमेशा की तरह झारखण्ड विधानसभा की ओर से पोर्टिंको नंबर दो के बगल में मीडिया के लिए अलग से मंच बना हुआ था, साथ ही उसके कुछ कदम की दूरी पर ही मीडियाकर्मियो के लिए पंडाल बना था। लेकिन हुआ क्या, हमेशा की तरह कुकुरमुत्ते की तरह उगे मीडियाकर्मियों ने पोर्टिकों और विधानसभा के प्रमुख द्वार को ही अपने कब्जे में ले लिया। विद्रोही24 ने देखा कि झारखण्ड विधानसभा के कुछ जिम्मेदार मार्शल इस माहौल को दूर करने के लिए प्रयासरत दिखे, लेकिन उनकी एक न चली।
यह भी देखा गया कि जिन मीडियाकर्मियों को ग्रीन कार्ड मिला था। उनके ग्रीन कार्ड पर साफ लिखा था कि उन्हें पोर्टिको चार से प्रवेश करना है। जो अनुशासन में विश्वास रखते हैं, वे पोर्टिको चार से ही विधानसभा के अंदर गये। लेकिन जो विधानसभा प्रेसदीर्घा समिति के उच्चाधिकारी व सदस्य हैं तथा उनके जो प्रेमी हैं, वे हमेशा की तरह पोर्टिको दो से ही विधानसभा में प्रवेश किये। जब विद्रोही24 ने इस संबंध में पूछा कि एक मीडियाकर्मी को पोर्टिकों चार से और दूसरे को पोर्टिको दो से प्रवेश क्यों कराया गया? तो उनका कहना था कि वे लोग विशेष व्यक्ति हैं, उन्हें विशेष कार्ड मिला है।
अब आगे देखिये, विधानसभा प्रेस दीर्घा की। जिन्हें ग्रीन कार्ड मिला था। वो तो प्रेस दीर्घा के अंदर गये ही। जिन्हें लाल कार्ड मिला था (लाल कार्ड वाले विधानसभा के अंदर प्रेस कक्ष तक ही जा सकते हैं।), वे भी प्रेस दीर्घा में बड़े ही शान से बैठे दिखे। हालांकि प्रेस दीर्घा प्रवेश द्वार पर तैनात महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन वो रोक नहीं सकी, क्योंकि प्रेस दीर्घा में बैठे एक कथित पत्रकार ने कह दिया कि आने दीजिये उन्हें। उपर के अधिकारी का उन्हें आदेश है। आश्चर्य की बात है कि ऐसा कोई आदेश नहीं था।
जव विद्रोही24 ने इस बारे में उक्त व्यक्ति से बात की, तो देखने में आया कि वो दोनों व्यक्ति जो पहले अवैध रुप से प्रेस दीर्घा में बैठा था, निकल कर पतली राह पकड़ ली। आमतौर पर झारखण्ड विधानसभा में लाल कार्ड, सफेद कार्ड व ग्रीन कार्ड तथा कुछ के लिए विशेष आईकार्ड दिये जाते हैं। जिसका लोग उसी अनुसार इस्तेमाल करते हैं। लेकिन झारखण्ड विधानसभा में अगर आप प्रेस दीर्घा में चले गये, समिति सदस्य बन गये तो आप आईकार्ड लटकाकर कुछ भी कर सकते हैं। आपको कोई बोलनेवाला नहीं हैं। यही नहीं, आप किसी को भी अपने बल पर प्रेस दीर्घा में घुमवा सकते हैं। उससे वीडियो भी बनवा सकते हैं और जब कोई टोके तो बोल दीजिये कि गलती से हो गया। उससे भूल हो गई।
आज भी प्रेस दीर्घा में झारखण्ड विधानसभा अध्यक्ष के आदेश का एक पंपलेट छपा था, जिसमें मोबाईल के साथ प्रवेश करने पर प्रतिबंध था। लेकिन प्रेस दीर्घा समिति के सदस्य के साथ-साथ, प्रेस दीर्घा में बैठे सभी लोग मोबाइल लेकर बैठे। बैठे ही नहीं, मोबाइल से दीर्घा में ही बैठकर बातचीत भी की। मोबाइल का आदान प्रदान किया।
क्या प्रेस दीर्घा में बैठे प्रेस दीर्घा समिति के सदस्य या कोई पत्रकार बता सकता है कि सदन में मोबाइल लेकर बैठे रहनेवाले विधानसभा सदस्य या मंत्री को कभी उन्होंने सदन में मोबाइल का उपयोग करते देखा है? अगर देखा भी होगा तो इक्का-दूक्का देखा होगा, जैसा ये पत्रकार प्रेस दीर्घा में बैठकर मोबाइल का दुरुपयोग करते हैं, वैसा तो नहीं ही देखा होगा। तो, ऐसे में फिर आप विधानसभाध्यक्ष के आदेश की अवहेलना क्यों कर रहे हैं? क्या आपको पता नहीं कि झारखण्ड विधासभाध्यक्ष आपके ही प्रेस दीर्घा समिति के अध्यक्ष भी है, जिनके आदेश का पालन करना आपका कर्तव्य भी बनता है, क्योंकि इस दीर्घा समिति का फायदा तो आप ही सर्वाधिक उठाते हैं, वो क्या कहते हैं, स्टडी टूर के नाम पर।
एक बार विद्रोही24 ने इन्हीं सभी बातों को लेकर झारखण्ड विधानसभाध्यक्ष से मिलने की सोची। हम उनके कक्ष के पास गये भी। लेकिन उनके विद्वान पीए ने एक घंटे तक बिठा दिया। न तो मिलवाया और न मिलने दिया। वहां तैनात पुलिसकर्मी भी उनसे मिलने नहीं दिया। (हमारी आदत रही है अनुशासन में रहने की, इसलिए जो जहां अधिकारी व कर्मचारी होता है, चाहे वो वरिष्ठ हो या कनिष्ठ, मैं उनका सम्मान करता हूं, भले ही वो मेरा सम्मान करें या न करें) जबकि इसी बीच प्रेस दीर्घा समिति के बड़े-बड़े पदाधिकारी हमारे सामने से उनके कक्ष में कई बार आये-गये। लेकिन झारखण्ड विधानसभाध्यक्ष हमसे नहीं मिले। वो नहीं मिले, ये उनका अधिकार क्षेत्र हैं। उसमें मैं भी कुछ नहीं कर सकता। लेकिन उनके बाद तो जनता की बड़ी अदालत है। जनता के बीच में ये बात आनी चाहिए। जनता के समक्ष मैंने रख दिया। जनता निर्णय करें। सत्य क्या है? और असत्य क्या है?