राजनीति

2026 से शुरू हो रहे नये परिसीमन को लेकर झामुमो ने जताई चिन्ता, कहा ये अतार्किक व चौकानेवाला, भाजपा अपने को सेट करने के लिए स्वहित में ला रही परिसीमन, होगा विरोध, 22 को भाजपा विरोधी दलों के नेताओं का चेन्नई में होगा जुटान

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के केन्द्रीय महासचिव व प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने आज संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि पूर्व में भी लोकसभा की सीटों का परिसीमन हुआ है। एक 1976 और दूसरा 2008 में और दोनों वक्त लोकसभा की कुल सीटें 543 ही रही, क्योकि भारतीय संविधान का आर्टिकल 81 कहता है कि लोकसभा की सीटों की संख्या 550 से अधिक नहीं होनी चाहिए। लेकिन अभी जो 2026 में परिसीमन होना है, उसमें जो ड्राफ्ट छनकर आ रही है। वो बड़ा ही अतार्किक व चौकानेवाला हैं। उसमें पता चल रहा है कि लोकसभा की सीटों की संख्या 846 तक करने की हैं।

सुप्रियो ने कहा कि 2008 में जब परिसीमन करने की कोशिश की गई थी। तब भी उनकी पार्टी ने इसका कड़ा विरोध किया था और व्यापक आंदोलन किये थे, क्योंकि पार्टी जानती थी, कि अगर ऐसा होगा तो जो हमारा प्रतिनिधित्व हैं, वो प्रभावित हो जायेगा, उस पर आघात पहुंचेगा। जिसका प्रभाव यह पड़ा कि झारखण्ड और नार्थ-ईस्ट को उस परिसीमन से अलग रखा गया।

सुप्रियो ने कहा कि जो परिसीमन हो रहा है। उस परिसीमन को 2001 के पोपुलेशन के सेंशस को आधार बनाया गया है। जबकि 2011 में भी हुई जनसंख्या के रिकार्ड हैं। लेकिन उसका अभी तक प्रकाशन नहीं हुआ। मतलब 25 साल के गैप को नजरंदाज कर दिया गया। जरा देखिये सीटें कैसे बढ़ाई गई है। उत्तरप्रदेश की लोकसभा सीट को 80 से 143, बिहार की 40 से 79, मध्यप्रदेश की 29 से 52, गुजरात की 26 से 43, राजस्थान की 25 से 50, महाराष्ट्र की 48 से 76, तमिलानाडु की 39 से 49, कर्नाटक की 28 से 41, आंध्रप्रदेश व तेलंगाना मिलाकर 42 से 54, झारखण्ड 14 से 24, बंगाल को 42 से 60 कर दिया गया है। मतलब मात्र दस राज्यों से ही लगभग 77 प्रतिशत सीटें निकाल ली गई।

सुप्रियो ने कहा देश के 29 राज्यों में से दस राज्यों का ही प्रतिनिधित्व 77 प्रतिशत हो गया। क्या ये जो आंचलिक जो अनेकता में एकता का देश है। क्या ये परिसीमन उसको एड्रेस कर पायेगा, सर्व कर पायेगा? ये परिसीमन साफ बताता है कि जिन राज्यों में भाजपा का जनाधार नहीं हैं, वहां की सीटें जानबूझकर कम कर दी गई है। खासकर जो आदिवासी क्षेत्र हैं, अनुसूचित क्षेत्र है। उसको टारगेट किया गया है। ये गंदी मानसिकता भारत सरकार लाने जा रही है।

सुप्रियो ने कहा कि पूरा का पूरा राजनीतिक विमर्श इस ओर चल रहा है कि भारत को दक्षिण, नार्थ ईस्ट और पूर्व से काट दो। नार्थ-ईस्ट में असम छोड़कर किसी भी राज्य की एक भी सीटें नहीं बढ़ाई गई हैं। असम की सीटें 14 से 21 करने की योजना है। दरअसल ये भाजपा के द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों को उनके हक से अलग करने का प्रयास है। ये भयावह है। हम इन आशंकाओं को देखते हुए ही पिछली बार आंदोलन किया था। हमारे यहां लोकसभा की 14 सीटों में पांच रिजर्व सीटें हैं। जब ये सीटें बढ़कर 24 हो जायेगी तो रिजर्व सीटें तो मात्र पांच ही रहेंगी, लेकिन 19 सीटें सामान्य हो जायेगी। ये खतरे की घंटी हैं- जनजातीय राजनीति व अल्पसंख्यक राजनीति के लिए।

सुप्रियो ने कहा कि सच्चाई यह है कि भाजपा को हेमन्त सोरेन की राजनीति से डर लगने लगा है। हेमन्त सोरेन के नेतृत्व से उन्हें डर लगने लगा है। हमलोग इस मंशा के खिलाफ है। जल्द ही चेन्नई में 22 को एम के स्टालिन के नेतृत्व में कई राजनीतिक दलों के लोग भाग लेंगे। जिसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन भाग लेंगे। उक्त बैठक में भाजपा शासित ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन मांझी को भी आमंत्रित किया गया है, क्योंकि सीटें तो उनके यहां भी कम होंगी, वे खुद आदिवासी समाज से आते हैं।

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