सदन में सरयू राय के खान एवं भूतत्व विभाग के सवाल पर सरकार एक बार फिर फंसती दिखी, सरयू राय ने सीधे पूछा कि कमेटी बनाने की जरुरत ही क्या थी? 842 करोड़ रुपये वन एवं पर्यावरण विभाग को क्यों नहीं ट्रांसफर किये गये?
आज जैसे ही सदन सात मिनट विलम्ब से शुरु हुआ। पहला सवाल हेमलाल मुर्मू का था। हेमलाल मुर्मू ने सरकार से पूछा कि क्या ये बात सही है कि हाल ही में कोलकाता में फरवरी 2025 में जो बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट संपन्न हुई है। उस समिट में झारखण्ड को 25 हजार करोड़ रुपये निवेश का प्रस्ताव मिला है। सरकार ने इस उत्तर का जवाब हां में दिया। हेमलाल मुर्मू का दूसरा सवाल था कि क्या राज्य में टेक्सटाइल उद्योगों की स्थापना नहीं की गई है। सरकार का कहना था कि ऐसा नहीं हैं।
हेमलाल मुर्मू ने यह भी पूछा क्या सरकार पाकुड़ जिले में उद्योगों को आदिवासी व पिछड़े जिलों में विशेष कर स्थापना करने का विचार रखती हैं। सरकार का कहना था कि उद्योग विभाग स्वयं उद्योगों की अधिष्ठापन नहीं करती। प्रस्तावित गोविंदपुर-साहेबगंज औद्योगिक गलियारा हेतु पाकुड़ जिले में 616.24 एकड़ भूमि को चिह्नित किया गया है। भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई विचाराधीन है। भूमि अधिग्रहण उपरांत पाकुड़ जिले में किसी भी औद्योगिक इकाई का अधिष्ठापन हेतु प्रस्ताव प्राप्त होने पर सरकार के विभिन्न नीतियों एवं नियमों के तहत भूमि आवंटन एवं अनुमान्य प्रोत्साहन प्रदान किया जा सकता है।
प्रदीप यादव ने अल्पसूचित प्रश्न में यह पूछा कि क्या यह सही है कि राज्य अधीनस्थ विश्वविद्यालय एवं अंगीभूत महाविद्यालयों में कुल 700 से अधिक आवश्यकता आधारित व्याख्याता यूजीसी रेगुलेशन के अनुरुप लंबे समय से कार्यरत है, जो अपनी समायोजन की मांग कर रहे हैं, क्या सरकार इनके समायोजन पर विचार रख रही है। सरकार का उत्तर था कि आवश्यकता आधारित शिक्षकों की सेवा विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न वर्षों में प्राप्त की गई है। विश्वविद्यालयों एवं अंगीभूत महाविद्यालयों में सृजित-नवसृजित रिक्त पदों पर नियमित नियुक्ति लंबित है, उन पदों पर नियमित नियुक्ति होने तक ही विश्वविद्यालयों द्वारा आवश्यकता आधारित सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति किये जाने का प्रावधान है।
सरयू राय के खान एवं भूतत्व विभाग के सवाल पर सरकार एक बार फिर फंसती दिखी और सही जवाब देने में असमर्थ दिखी। सरयू राय ने सरकार से पूछा कि कॉमन कॉज मुकदमा संख्या 114/2014 में पारित सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में खान विभाग के जिलावार मांग पत्र के अधिकांश मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के तहत् सक्षम प्राधिकार द्वारा क्या स्थगन आदेश पारित है? सरकार का कहना था कि न्यायादेश के आलोक में 189 मांग पत्रों में 139 मांगपत्रों के बावत् न्यायालय/न्यायाधिकरण द्वारा स्थगन आदेश पारित है। इसके बाद सरयू राय ने तुरन्त पूछा कि जब 139 में स्थगन हैं तो 50 पर सरकार क्या कर रही हैं। सरकार का कहना था कि बचे 50 में भी जिलास्तर पर कहीं न कहीं स्थगन आदेश पारित है।
सरयू राय का दूसरा सवाल था कि क्या यह बात सही है कि कोयला प्राधिकरण में लंबित इन स्थगन आदेशों का निपटारा राज्यहित में कराने के लिए खान विभाग सचेष्ट नहीं है, फलतः राजस्व की हानि हो रही है। सरकार का कहना था कि कोयला न्यायाधिकरण द्वारा अधिकांश कतिपय मामले में कमेटी द्वारा सुनवाई का अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से एक कमेटी का गठन किया गया था। कोल कम्पनियों द्वारा उक्त कमेटी के गठन के विरूद्ध उच्च न्यायालय रांची/ कोल/खान न्यायाधिकरण में वाद/पुनरीक्षण आवेदन दायर किया गया, जो विचाराधीन है।
सरयू राय ने यह भी पूछा कि सरकार को कमेटी बनाने की जरुरत ही क्या थी? कितनी वसूली हुई और ये पैसे कहां खर्च हुए? क्या ये पैसे वन एवं पर्यावरण विभाग को दिये गये? सरकार का कहना था कि कमेटी बनाना जरुरी था। सरकार ने 842 करोड़ रुपये वसूले हैं। समीक्षोपरांत जो सुप्रीम कोर्ट का गाइडलाइन्स है, उसके अनुसार खर्च करेंगे। सरयू राय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का गाइडलाइन्स तो 2014 का है, अब तो 11 साल हो गये, आखिर वे पैसे हैं कहां? समीक्षा की तो कोई जरुरत ही नहीं, ये पैसे सीधे वन एवं पर्यावरण विभाग को स्थानांतरित करना चाहिए। मंत्री का कहना था कि इस पैसों को वित्त विभाग द्वारा समीक्षा की जा रही है। ये पैसे कहां खर्च होंगे, बाद में बतायेंगे।